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महिलाओं द्वारा लिखे जा रहे चिट्ठों को समर्पित पहला हिन्दी चिट्ठा संकलक
कौन वसन्त?
कौन वसन्त कैसा वसन्त किसका वसन्त? किसीका ड्राइवर नौकर या कुक? या फिर सोसायटी का कोई वॉचमेन? देखा नहीं, सुना नहीं यह नाम! ओह वह स्कूल की छुट्टी, 'वसन्त पन्चमी' वाला वसन्त! वसन्त का प्रेम, प्रणय या विरह से भी है कोई सम्बन्ध? 'व ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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कृष्ण लीला .........भाग 35
जब कंस ने वत्सासुर का वध सुना [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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दिल्ली- याद का पहला पन्ना
Towards PSR प्लेन के रनवे पर चलते ही दिल में बारिशें शुरू हो गयीं थीं...हलके से एक हाथ सीने पर रखे हुए मैं उसे समझाने की कोशिश कर रही थी कि इस बार जल्दी आउंगी...इतने दिन नहीं अलग रहूंगी इस शहर से...मगर दिल ऐसा भरा भरा सा था कि कुछ समझन ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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फिर कैसे अश्रुपूरित नेत्रों से स्वयं का दोहन करूँ?
नहीं हूँ मैं देशभक्त क्या करूँ देशभक्त बनकर जब रोज नए घोटाले करने हैं जब रोज जनता को  लूटना खसोटना है जब रोज भ्रष्टाचार के  नए नए मार्ग खोजने हैं जब रोज सच का गला घोंटना है जब रोज गणतंत्र के नाम पर सब्जबाग दिखाना है चेहरे पर ए ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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गणतंत्र दिवस की बधाईयाँ
!! गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाईयाँ !! [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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प्यारा सा गणतंत्र हमारा
प्यारा-प्यारा देश हमारा. सारे जग से है ये न्यारा. [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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भारतीय गणतन्त्र चिरायु हो
भारतीय गणतन्त्र चिरायु हो  [पूरी प्रविष्ठि पढें]
..,तमाम शोरगुल में एक सिरा जो बीच-बीच में छूट या खो जाता है ,,,, तब ''मिलारेपा ''के शब्दों से बनती कविताओं में उसे ढूँढना दुधिया रौशनी में भी मुश्किल होगा ....
कुछ चीजों तक हम बार-बार पहुँचते हें कब कैसे और ये भी नहीं जानते कि वो हमारी खुशियों भरी  नियति क्यों बनती जाती है ..और हमेशा उन खुशियों का अकेलापन ---एक बनी बनाई चौखट से आर-पार आता-लेजाता रहता है चकित करता सा,शामे ढलती हें सुबहें होती ह ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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खोये हुए पल
बीते वो लम्हे जो सुख से भरे थे हरियाले से वह पत्ते अब क्यों पीले पड़ चले हैं पर अब भी याद है उन पलों की सोंधी सोंधी जब सिर्फ़ तुम्हारे छूने भर से देह तपने लगती थी लगती थी तपते होंठी की मोहर जब कभी गर्दन और काँधे पर तो झनझना के ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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खामोश हवाओं की गतिविधियों से वाकिफ नहीं होते ऐसे लोग
शब्दों के डार्ट पन्नों के डार्टबोर्ड सबके पास होते हैं कोई डार्ट से सफलता के अंक लाता है कोई पन्नों को बेशक्ल फाड़ देता है ! पन्नों को फाड़कर किसी के अंक मिटाकर वह भ्रम की उड़ान भरता है ' मैं जीत गया ' पर वह खुद को कचरे वाले गड् ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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अनायास ही उमड़ आतीं हैं क्यूँ - कुछ स्मृतियाँ
दोस्तों  [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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कुछ तो जुस्तजू अभी बाकी है………………
तुम लिखते नही या मुझ तक पहुंचते नही तुम्हारे वो खत जिसकी भाषा ,लिपि और व्याकरण सब मुझ पर आकर सिमट जाता है शायद संदेशवाहक बदल गये हैं या कबूतर अब तुम्हारी मुंडेर पर नही बैठते या शायद तुमने दाना डालना बंद कर दिया है तभी बहेलियों क ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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शी लव्स मी नॉट...
उसने एक गहरी सांस ली डूबने के ठीक पहले वाली या फिर  चूमने के ठीक बाद वाली  उसे ठीक से याद नहीं [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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एवज़
रोज़ की तरह चंपा ने उठकर खाना बनाया ओर डब्बा साइकल पर टांग दिया नौ बजे उसे काम पर पहुंचना था .माथे पर चमकीली बिंदी ,आँखों में काजल,तेल लगा कर संवारे बाल ओर धुली हुई साडी पहने वह काम पर जाने को तैयार थी. उसके पति भूरा ने एक भरपूर नज़र उस ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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"हिन्दी सीखो और प्रांतीयता का त्याग करो" : बंगालियों को सुभाष चन्द्र बोस की सलाह
 "हिन्दी सीखो और प्रांतीयता का त्याग करो" [पूरी प्रविष्ठि पढें]
वो न आए उनकी याद वफ़ा कर गई ...
वो न आए उनकी याद वफ़ा कर गई, उनसे मिलने की चाह सुकून तबाह कर गई, आहट दरवाज़े की हुई तो उठकर देखा, मज़ाक हमसे हवा कर गई ! [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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पूर्णता , अपूर्णता
कोई व्यक्ति कोई जगह कोई प्रश्न कोई हल .... पूर्ण है क्या ? किसी चित्रकार के चित्र में क्या सारी रेखाएं सही होती हैं ? क्या संस्कारों का एक ही परिणाम होता है ? जो तुम सोच रहे वही हर परिवेश की पृष्ठभूमि कैसे बन सकती है ? युगों स ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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हमें गुस्सा क्यों आता है.....
प्यार की तरह गुस्सा भी एक सहजमानवीय प्रतिक्रिया है, जब भी उन परिस्थितियों में फंस जाते हैं जो हमें पसंद नहींहैं, तो उन परिस्थितियों को अस्वीकारने का एक माध्यम है गुस्सा आना। इसी तरह जबहमारी इच्छाओं के विरुद्ध हमें कुछ करने को बाध्य किया ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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कृष्ण लीला .........भाग 34
 कान्हा की वर्षगांठ का दिन था आया नन्द बाबा ने खूब उत्सव था मनाया  [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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बाज़ार
बाज़ार  [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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प्रवृति
आज यूँ ही  छत पर डाल दिए थे  कुछ बाजरे के दाने  उन्हें देख  बहुत से कबूतर  आ गए थे खाने . खत्म हो गए दाने  तो टुकुर टुकुर  लगे ताकने  मैंने डाल दिए  फिर ढेर से दाने  कुछ दाने खा कर बाकी छोड़ कर   कबूतर उड़ गए  अपने ठिकाने . [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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कई शरीर जिंदा होते हैं ! ...
साँसों के जिंदा होने का सुकून बहुत बड़ा होता है यूँ जीना तो बस एक मुहर है - वो भी नकली ! आत्महत्या आसान नहीं गुनाह भी है तो जबरदस्ती जीना - क्या गुनाह नहीं ? जाने कितने लोग गुनहगार बन कतरा कतरा साँसें ले रहे ... और इनायत यह कि प ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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जिंदगी के सबसे खूबसूरत लम्हों की तसवीरें नहीं होतीं...
क्या कहूँ...आज के दिन का वाकई कुछ याद नहीं है...सिवाए इसके कि जितनी तुमने बाँहें खोली थीं उनमें पूरा आसमान आ जाता... रिश्ते पर जाती हूँ तो बस इतना है कि मैं बहुत खुश थी...और तुम भी. बस.  [पूरी प्रविष्ठि पढें]
अंडमान में बन्दर नहीं पाए जाते...
आपको सुनकर आश्चर्य होगा कि अंडमान में बन्दर नहीं पाए जाते. कानपुर में तो हमारे लान में खूब सारे बन्दर आते थे और पेड़ों और फूलों की डाली पर खेलते और उन्हें तोड़कर भाग जाते थे. जब मैं यहाँ अंडमान में नई-नई आई थी तो बंदरों को न देखकर सोचा कि ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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स्त्री मुक्ति को नया अर्थ दिया
आज एक ख्याल ने जन्म लिया स्त्री मुक्ति को नया अर्थ दिया [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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रात के ठीक साढ़े ग्यारह बजे...
हजारों किलोटन का एक हवाई जहाज़ है...उसकी सारी धमनियां बिछा कर एक रनवे बना दिया गया है...कहीं का पढ़ा हुआ बेफुजूल का कुछ याद आता है कि शरीर की सारी धमनियों को निकाल कर, जोड़ कर एक सीध में लपेटा जाए तो पूरी धरती के चारों ओर कुछ सात बार फि ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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याद
गली के मुहाने पर  बंद सा एक मकान  अपनी खामोश उदासियों  में भीगा सा  जाने क्यूँ पुकारता रहा मुझे  बरसों पहले  उसके बंद कपाटों से  आती महक  तेरा जिक्र होते ही  फिर छा गयी . [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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अपनी उम्र को तो शायद तूने तिजोरी में बंद कर रखा है ...........
ये कैसा चलन आया ज़माने का सुनता है घुटती हुई चीखें  [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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सुंदरकांड का पाठ और ढोल गंवार
अरुण कुमार झा छम्मकछल्लो के मित्र हैं. यह लेख डॉ. शिवशंकर मिश्र का है. अरुण जी ने इसे छम्मकछल्लो के ब्लॉग पर डालने का अनुरोध किया. लेख आपके सामने है. फिर भी प्रश्न छोडता है कि उस बेचारी महिला का ही क्या 99.99% महिलाओं का यही हाल है. जबत ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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मैं और मेरा ही मैं ...
" तुम थकती नहीं ? तूफ़ान के मध्य भी कैसे खा लेती हो ? कैसे हँस लेती हो ? कैसे औरों के लिए सोच लेती हो ? " ..... पूछता था मेरा ही मैं मुझसे ! [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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जान तुम्हारी सारी बातें, सुनती है वो चाँद की नानी
जान तुम्हारी सारी बातें सुनती है वो चाँद की नानी रात में मुझको चिट्ठी लिखना सांझ ढले तक बातें कहना [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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अतीत हमें वर्तमान में जीने नहीं देता
जिस किसी भी व्‍यक्ति के पास या देश के पास अपना अतीत नहीं होता वह वर्तमान में ही जीता है और भविष्‍य की कल्‍पना करता है लेकिन जिसके पास अतीत होता है वह अतीत में ही डूबा रहता है। वह वर्तमान में भी नहीं जी पाता और ना ही अपना भविष्‍य बना पात ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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कृष्ण लीला ........भाग 33
इक दिन फल बेचने वाली आई है जन्म -जन्म की आस में मोहन को आवाज़ लगायी है अरे कोई फल ले लो आवाज़ लगाती फिरती है मगर आज ना टोकरा खाली हुआ एक भी फल ना उसका बिका रोज का उसका नित्य कर्म था प्रभु दरस की लालसा में  नन्द द्वार पर आवाज़ ल ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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काठमांडू की वादियों में
हर दिन एक ही ढर्रे के बीच झूलती जिंदगी से जब मन ऊबने लगता है तो महापंडित राहुल सांकृत्यायन के यात्रा वृतांत 'अथातो घुम्मकड़ जिज्ञासा' पाठ में पढ़ी पंक्तियाँ याद आ जाती हैं-  ''सैर कर दुनिया की गाफिल, जिंदगानी फिर कहाँ, जिंदगानी गर रही ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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आकांक्षा यादव को मानद डाक्टरेट की उपाधि
विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ, भागलपुर, बिहार के सोलहवें महाधिवेशन में युवा कवयित्री, साहित्यकार एवं चर्चित ब्लागर आकांक्षा यादव को मानद डाक्टरेट (विद्यावाचस्पति) की उपाधि से विभूषित किया गया। आकांक्षा यादव को मानद डाक्टरेट की इस उपाधि के ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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मैं तुमसे नफरत करती हूँ...ओ कवि!
वे दिन बहुत खूबसूरत थे जो कि बेक़रार थे  सुलगते होठों को चूमने में गुजरी वो शामें थीं सबसे खूबसूरत  झुलसते जिस्म को सहलाते हुए बर्फ से ठंढे पानी से नहाया करती थी दिल्ली की जनवरी वाली ठंढ में ठीक आधी रात को  और तवे को उतार लेती थ ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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मुझे उस एक रोज की तलाश है.............
काश ऐसा एक रोज़ हर किसी की ज़िन्दगी मे आये [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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ठहरे हुए वक़्त ...
. [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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जिसे दिल-ओ-जान से चाहा, उ ...
जिसे दिल-ओ-जान से चाहा, उसे अपना न बना पाया, अब पूछ रहा है वीराना, क्या पाया बनके दीवाना ? [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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शायद तभी पक्के सौदे घाटे के नही होते……
उम्र की दराज खोलकर जो देखी उम्र ही वहाँ जमींदोज़ मिली सिर्फ़ एक लम्हा था रुका हुआ जिसके सीने मे था कैद ज़िन्दगी का वो सफ़ा  जहाँ मोहब्बत ने मोहब्बत को  जीया था कुछ लम्हा उसके बाद ना उसके पहले उम्र का ना कोई निशाँ मिला ये हुआ सौ ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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बात दिल की फ़िर होंठों तक आ कर रह गई
बदली दर्द की बरस कर पलकों पर रह गई [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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तुम्हें मालूम है कि जिस साल तुम आते हो नागफनी पर फूल आता है?
प्रेम नागफनी सरीखा है...ड्राईंग रूम के किसी कोने में उपेक्षित पड़ा रहेगा...पानी न दो, खाना न दो, ध्यान न दो...'आई डोंट केयर' से बेपरवाह...चुपचाप बढ़ता रहता है. --- एक नागफनी का बाग़ है...उसमें हर तरह के पेड़ हैं...यूँ कहो कि काँटों की ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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मकरसंक्रांति
सुबह उठते ही याद आया आज तो मकर संक्रांति है .चलो अब से दिन थोड़े बड़े होंगे ओर इस हाड़ कपाऊ सर्दी से थोड़ी राहत मिलेगी.सबसे पहला ख्याल तो यही आया.सन्डे  की छुट्टी ढेर सारा काम ओर त्यौहार ओर सबसे बड़ी बात काम वाली बाई की छुट्टी.सब काम से ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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ख्यालों की जड़ें - सिर्फ अपनी होती हैं !
शाम होते तुम्हारी यादें मेरी आँखों के पोरों में हरसिंगार की तरह खिल उठती हैं तुम्हारे होने का सुकून रात भर सपने सा चलता है ... ये सपने मेरा वजूद हैं या मैं सपनों का वजूद हूँ - नहीं जानती पर मेरे वजूद में तुम हो यह सच है ! यह स ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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शुष्क आँखों की समस्या और निदान
   जब कोई व्यक्ति बहुत दुखी परंतु अपना दुख अपनी व्यथा व्यक्तकरने के लिए उसकी आँख से आँसू नहीं बहते, तब अक्सर लोग कहते हैं कि अरे वह इतनादुखी है कि उसकी तो आँख के आँसू भी सूख गए हैं। पर आज हम उन आँसुओं की बात नहीं कररहे हैं। हम उन आँसुओ ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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तुम्हारा हर दिन जन्मदिन सा गुजरता रहे
चिड़ियाएं तो चिड़ियाएं ही होती हैं आँगन में फुदकती हैं कभी मुंडेर पर  तो कभी छज्जे पर कभी पानी की बाल्टी पर तो कभी आँगन में पड़े दानों पर फुदकती हैं , चहचहाती हैं  बेफिक्री से कैसे बतियाती हैं ना डर ना खौफ ना कोई चाहत बस एक पुर ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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अंडमान-निकोबार द्वीप पर्यटन उत्सव में अक्षिता (पाखी)
अंडमान में इन दिनों आइलैंड-फेस्टिवल की धूम है. मैं भी मामा-पापा और अपूर्वा के साथ घूमने गई थी. बड़ा मजा आया. मेरी तरह के ढेर सारे बच्चे वहाँ कार्यक्रम पेश कर रहे थे. कोई परी बना था तो कोई भालू, मोर, तोता, बन्दर, खरगोश, क्रोकोडाइल और बटर ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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आरम्भ
आरम्भ [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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मकर संक्रांति पर्व पर बधाइयाँ
!! मकर संक्रांति पर्व पर आप सभी को बधाइयाँ !! [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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सूरजप्रकाश जी, किताबें और रश्मि.....
23 दिसम्बर 2011- हम तीनों, मैं उमेश जी और विधु इन्दौर जाने के लिये तैयार.... लेकिन ट्रेन होते-होते छह घंटे लेट हो गयी [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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हँसता गाता मेरा बचपन
निश्छल मधुर सरस बचपन अब कहाँ से तुझे पाऊँ मैं बचपन [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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हैप्पी बर्थडे बिलाई
आज सुबह छह बजे नींद खुल गयी...अक्सर सुबह ही उठ रही हूँ वैसे...इस समय लिखना, पढना अच्छा लगता है. सुबह के इस पहर थोड़ा शहर का शोर रहता है पर आज जाने क्यूँ सारी आवाजें वही हैं जो देवघर में होती थीं...बहुत सा पंछियों की चहचहाहट...कव्वे, कबू ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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न दिया करो उधार के बोसे...इनका सूद चुकाते जिंदगी बीत जाती है
'बहुत खुश हूँ मैं आज...खुश...खुश...खुश...खुश...बहुत बहुत खुश...आज जो चाहे मांग लो!' प्रणय बीच सड़क पर ठिठका खड़ा था और वो उसके कंधे पर एक हाथ रखे उसके उसे धुरी बना कर उसके इर्द गिर्द दो बार घूम गयी और फिर उसके बायें कंधे पर एक हाथ रख कर ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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उसे चाँद ने सबसे छुपा के गढ़ा था...
वो चाँद की एक ऐसी कला थी जिसे चाँद ने सबसे छुपा के गढ़ा था...अपनी बाकी कलाओं से भी...चांदनी से भी...लड़की नहीं थी वो...सवा सोलह की उम्र थी उसकी...सवा सोलह चाँद रातों जितनी. [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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इसे चाल कहते हैं परिवर्तन नहीं !
स्वभाव नहीं बदलते - फिर भी लोग महिषासुर को वाल्मीकि बनाना चाहते हैं ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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कृष्ण लीला .......भाग 32
तब नारद जी ने बतलाया देवताओं  के सौ वर्ष बीतने पर कृष्ण सान्निध्य मिलने पर प्रभु चरणों में प्रेम होने पर स्वयं प्रभु अवतार ले  तुम्हारा उद्धार करेंगे  इतना कह नारद जी ने  नर नारायण आश्रम को प्रस्थान किया आश्रम जाने का भी अभिप्रा ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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जिंदगी की सबसे खूबसूरत चीज़...मोशन ब्लर
लड़की क्या थी पाँव में घुँघरू बांधे हवाएं थीं...सुरमई शाम को आसमान से उतरती चांदनी का गीत थी...बारिश के बाद भीगे गुलमोहर से टप-टप टपकती संतूर का राग थी...कहीं रूकती नहीं...पैर हमेशा थिरकते रहते उसके. गिरती-पड़ती उठ के खिलखिलाती...कैनवास ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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उदास है कोई
सुर्ख  मौसम में भी उदास है कोई होश गुम है बदहवास है कोई आसुओं  से जल गए रुखसार जिसके अपने साए को भी  भी नागवार है कोई आहटों को तौलता रहता है सन्नाटे को तोड़ता रहता है सडको पर दौड़ता रहता है मानो गुनाहगार है कोई [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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जाने वाले को टोकते नहीं हैं...
उसके यहाँ घर से निकलते हुए 'कहाँ जा रहे हो' पूछना अशुभ माना जाता था. उसपर घर के मर्द इतने लापरवाह थे कि कई बार शहर से बाहर भी जाना होता था तो माँ, भाभी या पत्नी को बताये बिना, बिना ढंग से कपड़े रखे हुए निकल जाते थे. घर की औरतें परेशान र ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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वक़्त निर्धारित करता है !!!
कहते हैं लोग - 'सुबह का भूला शाम को घर आ जाए तो भूला नहीं कहलाता ...' लोग ! बहुत बड़े मन वाले होते हैं कितनी अच्छी सोच रखते हैं हमेशा - दूसरों के लिए ...! पर - सोचनेवाली बात ये है कि सुबह का भूला किस शाम को आएगा उसी दिन या वर्ष ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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मेरा दाँत (teeth) खो गया...
आजकल मैं बहुत टेंशन में हूँ. मेरा एक मिल्की दाँत ( Milky Teeth) कई दिनों से हिल रहा था. मैं भी उसे अपनी जीभ से खूब परेशान करती और सोचती थी कि यह कब बाहर निकलेगा ? मैं अपना दाँत हाथों में लेकर खुद देखना चाहती थी. पर सब गड़बड़ हो गया. [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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Snow Fall Nainital - 9,th January 2012
After 4-5 years it was snow at Nainital again…Here I am Posting some pictures... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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आत्मदाह के दिन
दोपहर के ठीक पहले का पहर...किसी से इस तरह इश्क करना...समय जैसी किसी चीज़ के अस्तिव पर सवाल उठाते हुए...प्यार करना जैसे कि इस लम्हे से आगे कुछ नहीं है...कि इस लम्हे के बाद कुछ नहीं आएगा. वो इजाज़त मांगे तो उससे हाँ कहना कि वो तुम्हें बुर ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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इंतज़ार की सिलाई नही होती
तुम मुझे बातो के बताशे खिलाते हो  अभी आऊँगा थोडी देर मे तुम से ढेर सी बातें करूंगा कह जाते हो और मै आस की ऊँगली थामे खडी रहती हूँ चौखट पर एकटक दरवाज़े पर निगाह टिकाये जेठ की तपती दोपहर मे जानते हो इतनी देर मे एक इंतज़ार की चाद ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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बीस रूपये के नोट के पीछे किस जगह की फोटो है ??
आपने कभी 20 रूपये का नोट ध्यान से देखा है. नहीं ना, तो फिर इसका पिछला हिस्सा ध्यान से देखिए. इस पर समुद्र, लाइट-हॉउस और नारियल के पेड़ दिख रहे होंगें. आपको पता है, 20 रूपये की नोट के पीछे अंकित यह फोटो अंडमान में स्थित नार्थ-बे आइलैंड क ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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तुम तो जानते हो न, मुझे तुमसे बिछड़ना नहीं आता?
जान, अच्छा हुआ जो कल तुम्हारे पास वक़्त कम था...वरना दर्द के उस समंदर से हमें कौन उबार पाता...मैं अपने साथ तुम्हारी सांसें भी दाँव पर लगा के हार जाती...फिर हम कैसे जीते...कैसे? [पूरी प्रविष्ठि पढें]
20 टिप्पणियां
हर खुशी हो वहाँ तू जहाँ भी रहे
                                        पल्लवी और नेहा--------------एक गीत तुम्हारे लिये------- अनुराग जी की मदद से ऑडियो तो हासिल कर लिया पर तंग आ गई इसका ऑडियो नहीं बजने को तैयार हुआ डिव शेअर मुझसे रूठा है आपको सुनाए तो सुन लेना --यह ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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शायद इसीलिये किसी भी क्षितिज़ पर समानान्तर रेखायें नही मिलतीं
ये कौन सी वक्त ने साज़िश की देखो साजन तुम्हारी सजनी ना तुम्हारी रही कभी नख से शिख तक श्रृंगार मे तुम्हारा ही अक्स प्रतिबिम्बित होता था तुम्हारे लिये ही सजती संवरती थी हर सांस हर आहट हर धडकन सब तुम्हारे लिये ही महकते थे हर ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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खुदे हुए नाम
पुराने किले की [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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तुम मुझे उम्मीद ला दो ..
(1) तुम मुझे उम्मीद ला दो है वही कम ज़िन्दगी में आँखे मूंदे बैठे है कब से अँधेरे या तेज़ रौशनी में पड़ गए गहरे स्याह से ख्वाब मेरे प्यार वाले  जमा किये पल खोले जब भी राख निकली पोटली में तुम मुझे उम्मीद ला दो .. (2) [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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ध्यान को जीवन का अंतिम लक्ष्य बनाएं
यह सच है कि दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है। यह भी सचहै कि हमारे जीवन की रफ्तार भी बढ़ी है, लेकिन यह भी सच है कि हमारी जीवन शक्तिमें कमी आई है। निःसंदेह हमारी जीवनशैली पहले से बेहतर हुई है, पर यह भी सच है कि भौतिकवादकी इस शैली, जिसमें हम ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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छोटा कमरा
2009 में इस कहानी के कुछ अंश ब्लाग पर आ चुके हैं । आज पूरी कहानी --छोटा कमरा -- [पूरी प्रविष्ठि पढें]
13 टिप्पणियां
बुलाकर देखना तो !!!
कभी मुझे वापस लाना चाहो मुझसे बातें कर बचपन जीना चाहो तो पाए के पीछे से आवाज़ देना मैं लुकती छुपती आ जाऊँगी ... मुझे बच्चों सी ज़िन्दगी में ही मायने मिलते हैं ...... जब तुम्हारे गले में कुछ अटकता सा लगे अपने बालों में मेरी उँगलि ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
48 टिप्पणियां
खुदा तुम्हारी कलम को मुहब्बत बक्शे...
मैं किताबों की एक बेहद बड़ी दूकान में खड़ी थी...दूर तक जाते आईल थे जिनमें बहुत सी किताबें थीं...अक्सर उदास होने पर मैं ऐसी ही किसी जगह जाना पसंद करती हूँ...किताबों से मेरी दोस्ती बहुत पुरानी है इसलिए उनके पास जा के कोई सुकून ढूँढने की ख ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
17 टिप्पणियां
अपनों की दरिंदगी ......
शाम को न्यूज रूम में प्रेमी प्रेमिका के मर्डर पर काफी चर्चा हो रही थी। प्रेमी देवेंद्र ऑन स्पाट मर गया जब कि प्रेमिका सरिता जीवन के लिए संघर्ष कर रही है। तभी सोच लिया कि सरिता से मिलने जाना ही है। अगले दिन, सुबह की मीटिंग में मैने सरित ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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धानी, तुम्हारे वादों सा कच्चा
यादों का संदूक खोल सबसे ऊपर मिलेगा करीने से तह लगाया हुआ गहरे लाल रंग का लव यू [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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कि जैसे महबूब की मुस्कुराती आँखें
अरे, ऐसे कैसे! बताओ मुझे, कौन है वो दुष्ट जो तुम्हारे रातों की नींद सारी की सारी लेकर चल दिया और अपने वालेट में सजा के रखता है कि जैसे महबूब की मुस्कुराती आँखें [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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आधे घंटे में प्यार..!
फोन पर मैसेज आया, “तुझे कभी आठ घंटों में प्यार हुआ है?” प्रिया समझ गई फैसल को फिर किसी से प्यार हो गया है। उसने जवाब भेजा, “नहीं...पर जानती हूं तुझे हुआ है।” [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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समुद्र के अन्दर का जीवन कैसा होता होगा..
कभी आपने सोचा है कि समुद्र के अन्दर जीवन कैसा होता होगा. ढेर सारी रंग-बिरंगी मछलियाँ, कोरल्स, सीप, मोलस्क, साँप...और भी बहुत कुछ. और सोचिए वे सब कैसे मस्ती करते होंगें. अब मेरी इमेजिनेशन देखिये इस ड्राइंग के माध्यम से. मुझे लगता है कि स ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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जाओ यहाँ से ....
मत करो कोई प्रश्न मुझसे जवाब बनाते बनाते खुद को जांबांज दिखाते दिखाते मैं एक खाली कमरे सी हो गई हूँ ! संजोये हौसले मंद बयारें और मासूम मुस्कुराहटें मैं लुटाती गई और तुम सब पूछते गए ये कहाँ से ? ये कहाँ से ? और मैं झूठे नाम गिन ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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मेरे सफ़र पर ज़रा चलिये मेरे साथ
बोधि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित काव्य संग्रह मे मेरी कवितायें भी  [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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सोचा था वर्णित हो जाऊँगी
सोचा था वर्णित हो जाऊँगी मौन मुखरित हो जायेगा वेदना पुलकित हो जायेगी सुना था……………… एक अरसे के बाद  मौसम फिर पलटता है ज्वार फिर उठते हैं ज़िन्दगी फिर मचलती है मगर ऐसा नही होता जिस तरह ……… सफ़र मे साथ छूटने के बाद दोबारा मुसाफ़ ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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जबकि लड़की को रूठना नहीं आता और लड़के को मनाना...
असित ने बड़े इत्मीनान से कॉफ़ी में दो चम्मच चीनी डाली और हल्का सा सिप लिया...चश्मे के शीशे पर भाप आ गयी  तो उसे उतार कर कुरते के कोने से पोंछा और फिर कुछ देर सामने की दीवार पर लगी पेंटिंग पर नज़रें टिकायीं. छवि थोड़ी उदास थी आज...वरना त ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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कि किसने टाँके हैं मन के टूटे टुकड़े
मैं उसे रोक लेना चाहती थी सिर्फ इसलिए कि रात के इस पहर अकेले रोने का जी नहीं कर रहा था मगर कोई हक कहाँ बनता था उस पर मर रही होती तो बात दूसरी थी तब शायद पुकार सकती थी एक बार और [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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न जाने कौन हैं हम, न जाने ...
न जाने कौन हैं हम, न जाने क्या है मेरी पहचान, कोई तो हो जिसे हम कह सके अपना, हम जिसके लिए न रहे अंजान ! [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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कच्चे कश्मीरी सेब के रंग का हाफ स्वेटर
जब ख़त्म हो जायें शब्द मेरे तुम उँगलियों की पोरों से सुनना [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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ये कहानी नहीं है .....
वो कभी ये समझ नहीं पाया कि उसके साथ वो स्टेशन पर क्यों जाती थी। कई बार वो अलग पहुंचता और वो अलग। दोनों कुछ देर तक रेलवे स्टेशन पर साथ रहते। बात करते। गाड़ी आती और वो चला जाता। वो भी वापस लौट आती। यह सिलसिला सालों साल चला। एक दिन , वो अपन ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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मेरे ख्वाब
सघन मेघों की तरह कुछ मेरे ख्वाब हैं जो बरसना चाहते हैं पनपना चाहते हैं किसी मीठे फल की तरह ! कुछ ख्वाब हैं इन्द्रधनुषी जिनसे एक यादगार होली खेलना चाहती हूँ ! एक ख्याल है हिन्दुस्तां की राजकुमारी जैसे जो जिल्लेइलाही के खून की ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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Invitation of programme
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एचआईवी के खिलाफ एक गांव की जंग
कोल्हापुर से लौटकर अन्नू आनंद [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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विकलांगता तन की नहीं मन की होती है
विकलांगता तन की नहीं मन की होती है यूँ ही नहीं हौसलों में परवाज़ होती है [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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कृष्ण की व्यथा
नहीं कहा था मैंने  कि  गढ़ दो तुम  मुझे मूर्तियों में  नहीं चाहता था मैं  पत्थर होना  अलौकिक रहूँ  यह भी नहीं रही  चाहना मेरी , [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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कभी किरदार भी बदलो
आदाब ,आप सब को नया साल बहुत बहुत मुबारक हो . [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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द ब्लू बोगनविलिया सेड फोरगेट मी नॉट!
मैं मर चुकी हूँ। बलूत कीसीली लकड़ी के ताबूत में मेरी लाश रखी है। दफनाने के पहले का दिन है। मेरी जानपहचान के सारे लोग अंतिम दर्शन कर चुके हैं। आखिर में तुम्हारी बारी है और सबतुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं। तुम सपनों के देश गए हुये हो। [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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वीतराग!
तुमको भी एक ख़त लिखना था [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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वह बांसुरी जाने कहां गई जो मुहब्बत का गीत गाती थी...
घर, क़बीला, समाज, मज़हब और सिसायत भी हमारे चाँद-सूरज होते हैं, और इनको लगे ग्रहण के वक़्त जब किसी शायर, आशिक और दरवेश का जन्म होता है तो यह हकीकत है कि दर्द का मोती उसके मस्तक में पड़ जाता है... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
हिंदुस्तान, दैनिक जागरण और अमर उजाला में ब्लागर अक्षिता और 'पाखी की दुनिया' की चर्चा
(हिंदुस्तान, वाराणसी, 2 दिसंबर 2011 में चर्चा) [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ द्वारा कृष्ण कुमार यादव को ’विद्यावाचस्पति’ की मानद उपाधि
विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ, भागलपुर, बिहार के सोलहवें महाधिवेशन (13-14 दिसंबर 2011) में युवा साहित्यकार एवं भारतीय डाक सेवा के अधिकारी श्री कृष्ण कुमार यादव को ’विद्यावाचस्पति’ की मानद उपाधि से विभूषित किया गया। श्री यादव को यह उपाधि उ ... [पूरी प्रविष्ठि पढें]
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हिंदी विदेशी भाषा की तरह है
हिंदी विदेशी भाषा की तरह है [पूरी प्रविष्ठि पढें]
 
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कुछ बातें ...
कुछ मेरी कलम से kuch meri kalam se **
कुमाउँनी चेली
क्योंकि मैं झूठ नहीं बोलती......
खट्टी-मीठी यादें
गीत मेरे ........
गीत...............
घुघूतीबासूती
चित्रांगदा
ज़ख्म…जो फूलों ने दिये
ज़िन्दगी…एक खामोश सफ़र
ज्ञानवाणी: मत दीजिये मेडल , बधाई तो दे ही दीजिये .......
डॉ.कविता'किरण'(कवयित्री)
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