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Jan 27, 2012
| लेखिका: Mired Mirage
| चिट्ठा: घुघूतीबासूती
कौन वसन्त
कैसा वसन्त
किसका वसन्त?
किसीका ड्राइवर
नौकर या कुक?
या फिर सोसायटी का कोई वॉचमेन?
देखा नहीं, सुना नहीं यह नाम!
ओह वह स्कूल की छुट्टी,
'वसन्त पन्चमी' वाला वसन्त!
वसन्त का प्रेम, प्रणय या विरह
से भी है कोई सम्बन्ध?
'व ...
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Jan 27, 2012
| लेखिका: वन्दना
| चिट्ठा: एक प्रयास
जब कंस ने वत्सासुर का वध सुना
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Jan 27, 2012
| लेखिका: Puja Upadhyay
| चिट्ठा: लहरें
Towards PSR
प्लेन के रनवे पर चलते ही दिल में बारिशें शुरू हो गयीं थीं...हलके से एक हाथ सीने पर रखे हुए मैं उसे समझाने की कोशिश कर रही थी कि इस बार जल्दी आउंगी...इतने दिन नहीं अलग रहूंगी इस शहर से...मगर दिल ऐसा भरा भरा सा था कि कुछ समझन ...
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Jan 26, 2012
| लेखिका: वन्दना
| चिट्ठा: ज़िन्दगी…एक खामोश सफ़र
नहीं हूँ मैं देशभक्त
क्या करूँ देशभक्त बनकर
जब रोज नए घोटाले करने हैं
जब रोज जनता को
लूटना खसोटना है
जब रोज भ्रष्टाचार के
नए नए मार्ग खोजने हैं
जब रोज सच का गला घोंटना है
जब रोज गणतंत्र के नाम पर
सब्जबाग दिखाना है
चेहरे पर ए ...
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Jan 26, 2012
| लेखिका: Akanksha Yadav
| चिट्ठा: शब्द-शिखर
!! गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाईयाँ !!
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Jan 26, 2012
| लेखिका: Pakhi
| चिट्ठा: पाखी की दुनिया
प्यारा-प्यारा देश हमारा.
सारे जग से है ये न्यारा.
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Jan 25, 2012
| लेखिका: Kavita Vachaknavee
| चिट्ठा: "हिन्दी भारत"
भारतीय गणतन्त्र चिरायु हो
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Jan 25, 2012
| लेखिका: Vidhu
| चिट्ठा: ताना-बाना
कुछ चीजों तक हम बार-बार पहुँचते हें कब कैसे और ये भी नहीं जानते कि वो हमारी खुशियों भरी नियति क्यों बनती जाती है ..और हमेशा उन खुशियों का अकेलापन ---एक बनी बनाई चौखट से आर-पार आता-लेजाता रहता है चकित करता सा,शामे ढलती हें सुबहें होती ह ...
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Jan 25, 2012
| लेखिका: रंजना [रंजू भाटिया]
| चिट्ठा: कुछ मेरी कलम से kuch meri kalam se **
बीते वो लम्हे
जो सुख से भरे थे
हरियाले से वह पत्ते
अब क्यों पीले पड़ चले हैं
पर अब भी याद है
उन पलों की सोंधी सोंधी
जब सिर्फ़ तुम्हारे छूने भर से
देह तपने लगती थी
लगती थी तपते होंठी की मोहर जब
कभी गर्दन और काँधे पर
तो झनझना के ...
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Jan 25, 2012
| लेखिका: रश्मि प्रभा...
| चिट्ठा: मेरी भावनायें...
शब्दों के डार्ट पन्नों के डार्टबोर्ड सबके पास होते हैं
कोई डार्ट से सफलता के अंक लाता है
कोई पन्नों को बेशक्ल फाड़ देता है !
पन्नों को फाड़कर
किसी के अंक मिटाकर
वह भ्रम की उड़ान भरता है
' मैं जीत गया '
पर वह खुद को कचरे वाले गड् ...
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Jan 25, 2012
| लेखिका: वन्दना
| चिट्ठा: ज़ख्म…जो फूलों ने दिये
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Jan 24, 2012
| लेखिका: वन्दना
| चिट्ठा: ज़िन्दगी…एक खामोश सफ़र
तुम लिखते नही
या मुझ तक पहुंचते नही
तुम्हारे वो खत
जिसकी भाषा ,लिपि और व्याकरण
सब मुझ पर आकर सिमट जाता है
शायद संदेशवाहक बदल गये हैं
या कबूतर अब तुम्हारी मुंडेर पर नही बैठते
या शायद तुमने दाना डालना बंद कर दिया है
तभी बहेलियों क ...
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Jan 24, 2012
| लेखिका: Puja Upadhyay
| चिट्ठा: लहरें
उसने एक गहरी सांस ली
डूबने के ठीक पहले वाली
या फिर
चूमने के ठीक बाद वाली
उसे ठीक से याद नहीं
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Jan 23, 2012
| लेखिका: kase kahun?by kavita verma
| चिट्ठा: kase kahun?
रोज़ की तरह चंपा ने उठकर खाना बनाया ओर डब्बा साइकल पर टांग दिया नौ बजे उसे काम पर पहुंचना था .माथे पर चमकीली बिंदी ,आँखों में काजल,तेल लगा कर संवारे बाल ओर धुली हुई साडी पहने वह काम पर जाने को तैयार थी. उसके पति भूरा ने एक भरपूर नज़र उस ...
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Jan 23, 2012
| लेखिका: Kavita Vachaknavee
| चिट्ठा: "हिन्दी भारत"
"हिन्दी सीखो और प्रांतीयता का त्याग करो"
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Jan 23, 2012
| लेखिका: Urmi
| चिट्ठा: GULDASTE - E - SHAYARI
वो न आए उनकी याद वफ़ा कर गई,
उनसे मिलने की चाह सुकून तबाह कर गई,
आहट दरवाज़े की हुई तो उठकर देखा,
मज़ाक हमसे हवा कर गई !
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Jan 23, 2012
| लेखिका: रश्मि प्रभा...
| चिट्ठा: मेरी भावनायें...
कोई व्यक्ति
कोई जगह
कोई प्रश्न
कोई हल .... पूर्ण है क्या ?
किसी चित्रकार के चित्र में
क्या सारी रेखाएं सही होती हैं ?
क्या संस्कारों का एक ही परिणाम होता है ?
जो तुम सोच रहे
वही हर परिवेश की पृष्ठभूमि कैसे बन सकती है ?
युगों स ...
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Jan 22, 2012
| लेखिका: pratibha
| चिट्ठा: भगवान भरोसे
प्यार की तरह गुस्सा भी एक सहजमानवीय प्रतिक्रिया है, जब भी उन परिस्थितियों में फंस जाते हैं जो हमें पसंद नहींहैं, तो उन परिस्थितियों को अस्वीकारने का एक माध्यम है गुस्सा आना। इसी तरह जबहमारी इच्छाओं के विरुद्ध हमें कुछ करने को बाध्य किया ...
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Jan 22, 2012
| लेखिका: वन्दना
| चिट्ठा: एक प्रयास
कान्हा की वर्षगांठ का दिन था आया
नन्द बाबा ने खूब उत्सव था मनाया
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Jan 22, 2012
| लेखिका: रचना दीक्षित
| चिट्ठा: रचना रवीन्द्र
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Jan 21, 2012
| लेखिका: गीत
| चिट्ठा: गीत...............
आज यूँ ही
छत पर डाल दिए थे
कुछ बाजरे के दाने
उन्हें देख
बहुत से कबूतर
आ गए थे खाने .
खत्म हो गए दाने
तो टुकुर टुकुर
लगे ताकने
मैंने डाल दिए
फिर ढेर से दाने
कुछ दाने खा कर
बाकी छोड़ कर
कबूतर उड़ गए
अपने ठिकाने .
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Jan 21, 2012
| लेखिका: रश्मि प्रभा...
| चिट्ठा: मेरी भावनायें...
साँसों के जिंदा होने का सुकून बहुत बड़ा होता है
यूँ जीना तो बस एक मुहर है - वो भी नकली !
आत्महत्या आसान नहीं
गुनाह भी है
तो जबरदस्ती जीना - क्या गुनाह नहीं ?
जाने कितने लोग गुनहगार बन
कतरा कतरा साँसें ले रहे ...
और इनायत यह कि
प ...
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Jan 20, 2012
| लेखिका: Puja Upadhyay
| चिट्ठा: लहरें
क्या कहूँ...आज के दिन का वाकई कुछ याद नहीं है...सिवाए इसके कि जितनी तुमने बाँहें खोली थीं उनमें पूरा आसमान आ जाता...
रिश्ते पर जाती हूँ तो बस इतना है कि मैं बहुत खुश थी...और तुम भी. बस.
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Jan 20, 2012
| लेखिका: Pakhi
| चिट्ठा: पाखी की दुनिया
आपको सुनकर आश्चर्य होगा कि अंडमान में बन्दर नहीं पाए जाते. कानपुर में तो हमारे लान में खूब सारे बन्दर आते थे और पेड़ों और फूलों की डाली पर खेलते और उन्हें तोड़कर भाग जाते थे. जब मैं यहाँ अंडमान में नई-नई आई थी तो बंदरों को न देखकर सोचा कि ...
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Jan 20, 2012
| लेखिका: वन्दना
| चिट्ठा: ज़िन्दगी…एक खामोश सफ़र
आज एक ख्याल ने जन्म लिया
स्त्री मुक्ति को नया अर्थ दिया
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Jan 19, 2012
| लेखिका: Puja Upadhyay
| चिट्ठा: लहरें
हजारों किलोटन का एक हवाई जहाज़ है...उसकी सारी धमनियां बिछा कर एक रनवे बना दिया गया है...कहीं का पढ़ा हुआ बेफुजूल का कुछ याद आता है कि शरीर की सारी धमनियों को निकाल कर, जोड़ कर एक सीध में लपेटा जाए तो पूरी धरती के चारों ओर कुछ सात बार फि ...
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Jan 19, 2012
| लेखिका: kase kahun?by kavita verma
| चिट्ठा: kase kahun?
गली के मुहाने पर
बंद सा एक मकान
अपनी खामोश उदासियों
में भीगा सा
जाने क्यूँ पुकारता रहा मुझे
बरसों पहले
उसके बंद कपाटों से
आती महक
तेरा जिक्र होते ही
फिर छा गयी .
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Jan 19, 2012
| लेखिका: वन्दना
| चिट्ठा: ज़ख्म…जो फूलों ने दिये
ये कैसा चलन आया ज़माने का
सुनता है घुटती हुई चीखें
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Jan 19, 2012
| लेखिका: vibha rani
| चिट्ठा: chhammakchhallo kahis
अरुण कुमार झा छम्मकछल्लो के मित्र हैं. यह लेख डॉ. शिवशंकर मिश्र का है. अरुण जी ने इसे छम्मकछल्लो के ब्लॉग पर डालने का अनुरोध किया. लेख आपके सामने है. फिर भी प्रश्न छोडता है कि उस बेचारी महिला का ही क्या 99.99% महिलाओं का यही हाल है. जबत ...
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Jan 18, 2012
| लेखिका: रश्मि प्रभा...
| चिट्ठा: मेरी भावनायें...
" तुम थकती नहीं ?
तूफ़ान के मध्य भी कैसे खा लेती हो ?
कैसे हँस लेती हो ?
कैसे औरों के लिए सोच लेती हो ? "
..... पूछता था मेरा ही मैं मुझसे !
[ पूरी प्रविष्ठि पढें]
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Jan 18, 2012
| लेखिका: Puja Upadhyay
| चिट्ठा: लहरें
जान तुम्हारी सारी बातें
सुनती है वो चाँद की नानी
रात में मुझको चिट्ठी लिखना
सांझ ढले तक बातें कहना
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Jan 18, 2012
| लेखिका: ajit gupta
| चिट्ठा: Dr. Smt. Ajit Gupta
जिस किसी भी व्यक्ति के पास या देश के पास अपना अतीत नहीं होता वह वर्तमान में ही जीता है और भविष्य की कल्पना करता है लेकिन जिसके पास अतीत होता है वह अतीत में ही डूबा रहता है। वह वर्तमान में भी नहीं जी पाता और ना ही अपना भविष्य बना पात ...
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Jan 18, 2012
| लेखिका: वन्दना
| चिट्ठा: एक प्रयास
इक दिन फल बेचने वाली आई है
जन्म -जन्म की आस में
मोहन को आवाज़ लगायी है
अरे कोई फल ले लो
आवाज़ लगाती फिरती है
मगर आज ना टोकरा खाली हुआ
एक भी फल ना उसका बिका
रोज का उसका नित्य कर्म था
प्रभु दरस की लालसा में
नन्द द्वार पर आवाज़ ल ...
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Jan 18, 2012
| लेखिका: कविता रावत
| चिट्ठा: KAVITARAWATBPL
हर दिन एक ही ढर्रे के बीच झूलती जिंदगी से जब मन ऊबने लगता है तो महापंडित राहुल सांकृत्यायन के यात्रा वृतांत 'अथातो घुम्मकड़ जिज्ञासा' पाठ में पढ़ी पंक्तियाँ याद आ जाती हैं-
''सैर कर दुनिया की गाफिल, जिंदगानी फिर कहाँ,
जिंदगानी गर रही ...
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Jan 17, 2012
| लेखिका: Krishna Kr. Yadav
| चिट्ठा: शब्द-शिखर
विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ, भागलपुर, बिहार के सोलहवें महाधिवेशन में युवा कवयित्री, साहित्यकार एवं चर्चित ब्लागर आकांक्षा यादव को मानद डाक्टरेट (विद्यावाचस्पति) की उपाधि से विभूषित किया गया। आकांक्षा यादव को मानद डाक्टरेट की इस उपाधि के ...
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Jan 17, 2012
| लेखिका: Puja Upadhyay
| चिट्ठा: लहरें
वे दिन बहुत खूबसूरत थे
जो कि बेक़रार थे
सुलगते होठों को चूमने में गुजरी वो शामें
थीं सबसे खूबसूरत
झुलसते जिस्म को सहलाते हुए
बर्फ से ठंढे पानी से नहाया करती थी
दिल्ली की जनवरी वाली ठंढ में
ठीक आधी रात को
और तवे को उतार लेती थ ...
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Jan 17, 2012
| लेखिका: वन्दना
| चिट्ठा: ज़िन्दगी…एक खामोश सफ़र
काश ऐसा एक रोज़ हर किसी की ज़िन्दगी मे आये
[ पूरी प्रविष्ठि पढें]
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Jan 17, 2012
| लेखिका: रश्मि प्रभा...
| चिट्ठा: मेरी भावनायें...
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Jan 16, 2012
| लेखिका: Urmi
| चिट्ठा: GULDASTE - E - SHAYARI
जिसे दिल-ओ-जान से चाहा,
उसे अपना न बना पाया,
अब पूछ रहा है वीराना,
क्या पाया बनके दीवाना ?
[ पूरी प्रविष्ठि पढें]
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Jan 16, 2012
| लेखिका: वन्दना
| चिट्ठा: ज़ख्म…जो फूलों ने दिये
उम्र की दराज खोलकर जो देखी
उम्र ही वहाँ जमींदोज़ मिली
सिर्फ़ एक लम्हा था रुका हुआ
जिसके सीने मे था कैद
ज़िन्दगी का वो सफ़ा
जहाँ मोहब्बत ने मोहब्बत को
जीया था कुछ लम्हा
उसके बाद ना उसके पहले
उम्र का ना कोई निशाँ मिला
ये हुआ सौ ...
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Jan 16, 2012
| लेखिका: रंजना [रंजू भाटिया]
| चिट्ठा: कुछ मेरी कलम से kuch meri kalam se **
बदली दर्द की बरस कर पलकों पर रह गई
[ पूरी प्रविष्ठि पढें]
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Jan 16, 2012
| लेखिका: Puja Upadhyay
| चिट्ठा: लहरें
प्रेम नागफनी सरीखा है...ड्राईंग रूम के किसी कोने में उपेक्षित पड़ा रहेगा...पानी न दो, खाना न दो, ध्यान न दो...'आई डोंट केयर' से बेपरवाह...चुपचाप बढ़ता रहता है.
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एक नागफनी का बाग़ है...उसमें हर तरह के पेड़ हैं...यूँ कहो कि काँटों की ...
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Jan 15, 2012
| लेखिका: kase kahun?by kavita verma
| चिट्ठा: kase kahun?
सुबह उठते ही याद आया आज तो मकर संक्रांति है .चलो अब से दिन थोड़े बड़े होंगे ओर इस हाड़ कपाऊ सर्दी से थोड़ी राहत मिलेगी.सबसे पहला ख्याल तो यही आया.सन्डे की छुट्टी ढेर सारा काम ओर त्यौहार ओर सबसे बड़ी बात काम वाली बाई की छुट्टी.सब काम से ...
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Jan 15, 2012
| लेखिका: रश्मि प्रभा...
| चिट्ठा: मेरी भावनायें...
शाम होते तुम्हारी यादें
मेरी आँखों के पोरों में
हरसिंगार की तरह खिल उठती हैं
तुम्हारे होने का सुकून
रात भर सपने सा चलता है ...
ये सपने मेरा वजूद हैं
या मैं सपनों का वजूद हूँ
- नहीं जानती
पर मेरे वजूद में तुम हो
यह सच है !
यह स ...
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Jan 15, 2012
| लेखिका: pratibha
| चिट्ठा: भगवान भरोसे
जब कोई व्यक्ति बहुत दुखी परंतु अपना दुख अपनी व्यथा व्यक्तकरने के लिए उसकी आँख से आँसू नहीं बहते, तब अक्सर लोग कहते हैं कि अरे वह इतनादुखी है कि उसकी तो आँख के आँसू भी सूख गए हैं। पर आज हम उन आँसुओं की बात नहीं कररहे हैं। हम उन आँसुओ ...
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Jan 15, 2012
| लेखिका: वन्दना
| चिट्ठा: ज़िन्दगी…एक खामोश सफ़र
चिड़ियाएं तो चिड़ियाएं ही होती हैं
आँगन में फुदकती हैं
कभी मुंडेर पर
तो कभी छज्जे पर
कभी पानी की बाल्टी पर
तो कभी आँगन में पड़े दानों पर
फुदकती हैं , चहचहाती हैं
बेफिक्री से कैसे बतियाती हैं
ना डर ना खौफ ना कोई चाहत
बस एक पुर ...
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Jan 15, 2012
| लेखिका: Pakhi
| चिट्ठा: पाखी की दुनिया
अंडमान में इन दिनों आइलैंड-फेस्टिवल की धूम है. मैं भी मामा-पापा और अपूर्वा के साथ घूमने गई थी. बड़ा मजा आया. मेरी तरह के ढेर सारे बच्चे वहाँ कार्यक्रम पेश कर रहे थे. कोई परी बना था तो कोई भालू, मोर, तोता, बन्दर, खरगोश, क्रोकोडाइल और बटर ...
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Jan 15, 2012
| लेखिका: रचना दीक्षित
| चिट्ठा: रचना रवीन्द्र
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Jan 14, 2012
| लेखिका: Pakhi
| चिट्ठा: पाखी की दुनिया
!! मकर संक्रांति पर्व पर आप सभी को बधाइयाँ !!
[ पूरी प्रविष्ठि पढें]
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Jan 14, 2012
| लेखिका: वन्दना अवस्थी दुबे
| चिट्ठा: अपनी बात...
23 दिसम्बर 2011-
हम तीनों, मैं उमेश जी और विधु इन्दौर जाने के लिये तैयार....
लेकिन ट्रेन होते-होते छह घंटे लेट हो गयी
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Jan 14, 2012
| लेखिका: वन्दना
| चिट्ठा: ज़ख्म…जो फूलों ने दिये
निश्छल मधुर सरस बचपन
अब कहाँ से तुझे पाऊँ मैं बचपन
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Jan 14, 2012
| लेखिका: Puja Upadhyay
| चिट्ठा: लहरें
आज सुबह छह बजे नींद खुल गयी...अक्सर सुबह ही उठ रही हूँ वैसे...इस समय लिखना, पढना अच्छा लगता है. सुबह के इस पहर थोड़ा शहर का शोर रहता है पर आज जाने क्यूँ सारी आवाजें वही हैं जो देवघर में होती थीं...बहुत सा पंछियों की चहचहाहट...कव्वे, कबू ...
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Jan 13, 2012
| लेखिका: Puja Upadhyay
| चिट्ठा: लहरें
'बहुत खुश हूँ मैं आज...खुश...खुश...खुश...खुश...बहुत बहुत खुश...आज जो चाहे मांग लो!' प्रणय बीच सड़क पर ठिठका खड़ा था और वो उसके कंधे पर एक हाथ रखे उसके उसे धुरी बना कर उसके इर्द गिर्द दो बार घूम गयी और फिर उसके बायें कंधे पर एक हाथ रख कर ...
[ पूरी प्रविष्ठि पढें]
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Jan 13, 2012
| लेखिका: Puja Upadhyay
| चिट्ठा: लहरें
वो चाँद की एक ऐसी कला थी जिसे चाँद ने सबसे छुपा के गढ़ा था...अपनी बाकी कलाओं से भी...चांदनी से भी...लड़की नहीं थी वो...सवा सोलह की उम्र थी उसकी...सवा सोलह चाँद रातों जितनी.
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Jan 13, 2012
| लेखिका: रश्मि प्रभा...
| चिट्ठा: मेरी भावनायें...
स्वभाव नहीं बदलते -
फिर भी लोग महिषासुर को
वाल्मीकि बनाना चाहते हैं ...
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Jan 13, 2012
| लेखिका: वन्दना
| चिट्ठा: एक प्रयास
तब नारद जी ने बतलाया
देवताओं के सौ वर्ष बीतने पर
कृष्ण सान्निध्य मिलने पर
प्रभु चरणों में प्रेम होने पर
स्वयं प्रभु अवतार ले
तुम्हारा उद्धार करेंगे
इतना कह नारद जी ने
नर नारायण आश्रम को प्रस्थान किया
आश्रम जाने का भी अभिप्रा ...
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Jan 12, 2012
| लेखिका: Puja Upadhyay
| चिट्ठा: लहरें
लड़की क्या थी पाँव में घुँघरू बांधे हवाएं थीं...सुरमई शाम को आसमान से उतरती चांदनी का गीत थी...बारिश के बाद भीगे गुलमोहर से टप-टप टपकती संतूर का राग थी...कहीं रूकती नहीं...पैर हमेशा थिरकते रहते उसके. गिरती-पड़ती उठ के खिलखिलाती...कैनवास ...
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Jan 12, 2012
| लेखिका: Sonal Rastogi
| चिट्ठा: कुछ कहानियाँ,कुछ नज्में
सुर्ख मौसम में भी उदास है कोई
होश गुम है बदहवास है कोई
आसुओं से जल गए रुखसार जिसके
अपने साए को भी भी नागवार है कोई
आहटों को तौलता रहता है
सन्नाटे को तोड़ता रहता है
सडको पर दौड़ता रहता है
मानो गुनाहगार है कोई
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Jan 12, 2012
| लेखिका: Puja Upadhyay
| चिट्ठा: लहरें
उसके यहाँ घर से निकलते हुए 'कहाँ जा रहे हो' पूछना अशुभ माना जाता था. उसपर घर के मर्द इतने लापरवाह थे कि कई बार शहर से बाहर भी जाना होता था तो माँ, भाभी या पत्नी को बताये बिना, बिना ढंग से कपड़े रखे हुए निकल जाते थे. घर की औरतें परेशान र ...
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Jan 11, 2012
| लेखिका: रश्मि प्रभा...
| चिट्ठा: मेरी भावनायें...
कहते हैं लोग -
'सुबह का भूला शाम को घर आ जाए
तो भूला नहीं कहलाता ...'
लोग !
बहुत बड़े मन वाले होते हैं
कितनी अच्छी सोच रखते हैं हमेशा
- दूसरों के लिए ...!
पर - सोचनेवाली बात ये है कि
सुबह का भूला किस शाम को आएगा
उसी दिन या वर्ष ...
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Jan 11, 2012
| लेखिका: Pakhi
| चिट्ठा: पाखी की दुनिया
आजकल मैं बहुत टेंशन में हूँ. मेरा एक मिल्की दाँत ( Milky Teeth) कई दिनों से हिल रहा था. मैं भी उसे अपनी जीभ से खूब परेशान करती और सोचती थी कि यह कब बाहर निकलेगा ? मैं अपना दाँत हाथों में लेकर खुद देखना चाहती थी. पर सब गड़बड़ हो गया.
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Jan 11, 2012
| लेखिका: विनीता यशस्वी
| चिट्ठा: यशस्वी
After 4-5 years it was snow at Nainital again…Here I am Posting some pictures...
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Jan 11, 2012
| लेखिका: Puja Upadhyay
| चिट्ठा: लहरें
दोपहर के ठीक पहले का पहर...किसी से इस तरह इश्क करना...समय जैसी किसी चीज़ के अस्तिव पर सवाल उठाते हुए...प्यार करना जैसे कि इस लम्हे से आगे कुछ नहीं है...कि इस लम्हे के बाद कुछ नहीं आएगा. वो इजाज़त मांगे तो उससे हाँ कहना कि वो तुम्हें बुर ...
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Jan 11, 2012
| लेखिका: वन्दना
| चिट्ठा: ज़िन्दगी…एक खामोश सफ़र
तुम मुझे बातो के बताशे खिलाते हो
अभी आऊँगा थोडी देर मे
तुम से ढेर सी बातें करूंगा
कह जाते हो और मै
आस की ऊँगली थामे
खडी रहती हूँ चौखट पर
एकटक दरवाज़े पर
निगाह टिकाये
जेठ की तपती दोपहर मे
जानते हो इतनी देर मे
एक इंतज़ार की चाद ...
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Jan 10, 2012
| लेखिका: Pakhi
| चिट्ठा: पाखी की दुनिया
आपने कभी 20 रूपये का नोट ध्यान से देखा है. नहीं ना, तो फिर इसका पिछला हिस्सा ध्यान से देखिए. इस पर समुद्र, लाइट-हॉउस और नारियल के पेड़ दिख रहे होंगें. आपको पता है, 20 रूपये की नोट के पीछे अंकित यह फोटो अंडमान में स्थित नार्थ-बे आइलैंड क ...
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Jan 10, 2012
| लेखिका: Puja Upadhyay
| चिट्ठा: लहरें
जान,
अच्छा हुआ जो कल तुम्हारे पास वक़्त कम था...वरना दर्द के उस समंदर से हमें कौन उबार पाता...मैं अपने साथ तुम्हारी सांसें भी दाँव पर लगा के हार जाती...फिर हम कैसे जीते...कैसे?
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Jan 9, 2012
| लेखिका: Archana
| चिट्ठा: मेरे मन की
पल्लवी और नेहा--------------एक गीत तुम्हारे लिये-------
अनुराग जी की मदद से ऑडियो तो हासिल कर लिया पर तंग आ गई इसका ऑडियो नहीं बजने को तैयार हुआ डिव शेअर मुझसे रूठा है आपको सुनाए तो सुन लेना --यह ...
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Jan 9, 2012
| लेखिका: वन्दना
| चिट्ठा: ज़ख्म…जो फूलों ने दिये
ये कौन सी वक्त ने साज़िश की
देखो साजन
तुम्हारी सजनी
ना तुम्हारी रही
कभी नख से शिख तक
श्रृंगार मे
तुम्हारा ही अक्स
प्रतिबिम्बित होता था
तुम्हारे लिये ही
सजती संवरती थी
हर सांस
हर आहट
हर धडकन
सब तुम्हारे लिये ही
महकते थे
हर ...
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Jan 9, 2012
| लेखिका: रंजना [रंजू भाटिया]
| चिट्ठा: कुछ मेरी कलम से kuch meri kalam se **
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Jan 9, 2012
| लेखिका: Sonal Rastogi
| चिट्ठा: कुछ कहानियाँ,कुछ नज्में
(1)
तुम मुझे उम्मीद ला दो
है वही कम ज़िन्दगी में
आँखे मूंदे बैठे है कब से
अँधेरे या तेज़ रौशनी में
पड़ गए गहरे स्याह से
ख्वाब मेरे प्यार वाले
जमा किये पल खोले जब भी
राख निकली पोटली में
तुम मुझे उम्मीद ला दो ..
(2)
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Jan 9, 2012
| लेखिका: pratibha
| चिट्ठा: भगवान भरोसे
यह सच है कि दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है। यह भी सचहै कि हमारे जीवन की रफ्तार भी बढ़ी है, लेकिन यह भी सच है कि हमारी जीवन शक्तिमें कमी आई है। निःसंदेह हमारी जीवनशैली पहले से बेहतर हुई है, पर यह भी सच है कि भौतिकवादकी इस शैली, जिसमें हम ...
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Jan 9, 2012
| लेखिका: पारुल "पुखराज"
| चिट्ठा: …पारूल…चाँद पुखराज का……
2009 में इस कहानी के कुछ अंश ब्लाग पर आ चुके हैं । आज पूरी कहानी --छोटा कमरा --
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Jan 9, 2012
| लेखिका: रश्मि प्रभा...
| चिट्ठा: मेरी भावनायें...
कभी मुझे वापस लाना चाहो
मुझसे बातें कर बचपन जीना चाहो
तो पाए के पीछे से आवाज़ देना
मैं लुकती छुपती आ जाऊँगी ...
मुझे बच्चों सी ज़िन्दगी में ही मायने मिलते हैं
......
जब तुम्हारे गले में कुछ अटकता सा लगे
अपने बालों में
मेरी उँगलि ...
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Jan 8, 2012
| लेखिका: Puja Upadhyay
| चिट्ठा: लहरें
मैं किताबों की एक बेहद बड़ी दूकान में खड़ी थी...दूर तक जाते आईल थे जिनमें बहुत सी किताबें थीं...अक्सर उदास होने पर मैं ऐसी ही किसी जगह जाना पसंद करती हूँ...किताबों से मेरी दोस्ती बहुत पुरानी है इसलिए उनके पास जा के कोई सुकून ढूँढने की ख ...
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Jan 8, 2012
| लेखिका: MANVINDER BHIMBER
| चिट्ठा: मेरे आस-पास
शाम को न्यूज रूम में प्रेमी प्रेमिका के मर्डर पर काफी चर्चा हो रही थी। प्रेमी देवेंद्र ऑन स्पाट मर गया जब कि प्रेमिका सरिता जीवन के लिए संघर्ष कर रही है। तभी सोच लिया कि सरिता से मिलने जाना ही है।
अगले दिन, सुबह की मीटिंग में मैने सरित ...
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Jan 7, 2012
| लेखिका: Puja Upadhyay
| चिट्ठा: लहरें
यादों का संदूक खोल
सबसे ऊपर मिलेगा
करीने से तह लगाया हुआ
गहरे लाल रंग का
लव यू
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Jan 7, 2012
| लेखिका: Puja Upadhyay
| चिट्ठा: लहरें
अरे, ऐसे कैसे!
बताओ मुझे, कौन है वो दुष्ट
जो तुम्हारे रातों की नींद
सारी की सारी लेकर चल दिया
और अपने वालेट में सजा के रखता है
कि जैसे महबूब की मुस्कुराती आँखें
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Jan 7, 2012
| लेखिका: शबनम खान
| चिट्ठा: क्योंकि मैं झूठ नहीं बोलती......
फोन पर मैसेज आया, “तुझे कभी आठ घंटों में प्यार हुआ है?” प्रिया समझ गई फैसल को फिर किसी से प्यार हो गया है। उसने जवाब भेजा, “नहीं...पर जानती हूं तुझे हुआ है।”
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Jan 7, 2012
| लेखिका: Pakhi
| चिट्ठा: पाखी की दुनिया
कभी आपने सोचा है कि समुद्र के अन्दर जीवन कैसा होता होगा. ढेर सारी रंग-बिरंगी मछलियाँ, कोरल्स, सीप, मोलस्क, साँप...और भी बहुत कुछ. और सोचिए वे सब कैसे मस्ती करते होंगें. अब मेरी इमेजिनेशन देखिये इस ड्राइंग के माध्यम से. मुझे लगता है कि स ...
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Jan 7, 2012
| लेखिका: रश्मि प्रभा...
| चिट्ठा: मेरी भावनायें...
मत करो कोई प्रश्न मुझसे
जवाब बनाते बनाते
खुद को जांबांज दिखाते दिखाते
मैं एक खाली कमरे सी हो गई हूँ !
संजोये हौसले
मंद बयारें
और मासूम मुस्कुराहटें
मैं लुटाती गई
और तुम सब पूछते गए
ये कहाँ से ? ये कहाँ से ?
और मैं झूठे नाम गिन ...
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Jan 7, 2012
| लेखिका: वन्दना
| चिट्ठा: ज़ख्म…जो फूलों ने दिये
बोधि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित काव्य संग्रह मे मेरी कवितायें भी
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Jan 7, 2012
| लेखिका: वन्दना
| चिट्ठा: ज़िन्दगी…एक खामोश सफ़र
सोचा था वर्णित हो जाऊँगी
मौन मुखरित हो जायेगा
वेदना पुलकित हो जायेगी
सुना था………………
एक अरसे के बाद
मौसम फिर पलटता है
ज्वार फिर उठते हैं
ज़िन्दगी फिर मचलती है
मगर ऐसा नही होता
जिस तरह ………
सफ़र मे साथ छूटने के बाद
दोबारा मुसाफ़ ...
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Jan 7, 2012
| लेखिका: Puja Upadhyay
| चिट्ठा: लहरें
असित ने बड़े इत्मीनान से कॉफ़ी में दो चम्मच चीनी डाली और हल्का सा सिप लिया...चश्मे के शीशे पर भाप आ गयी तो उसे उतार कर कुरते के कोने से पोंछा और फिर कुछ देर सामने की दीवार पर लगी पेंटिंग पर नज़रें टिकायीं. छवि थोड़ी उदास थी आज...वरना त ...
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Jan 6, 2012
| लेखिका: Puja Upadhyay
| चिट्ठा: लहरें
मैं उसे रोक लेना चाहती थी
सिर्फ इसलिए कि रात के इस पहर
अकेले रोने का जी नहीं कर रहा था
मगर कोई हक कहाँ बनता था उस पर
मर रही होती तो बात दूसरी थी
तब शायद पुकार सकती थी
एक बार और
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Jan 6, 2012
| लेखिका: Urmi
| चिट्ठा: GULDASTE - E - SHAYARI
न जाने कौन हैं हम,
न जाने क्या है मेरी पहचान,
कोई तो हो जिसे हम कह सके अपना,
हम जिसके लिए न रहे अंजान !
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Jan 6, 2012
| लेखिका: Puja Upadhyay
| चिट्ठा: लहरें
जब ख़त्म हो जायें शब्द मेरे
तुम उँगलियों की पोरों से सुनना
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Jan 5, 2012
| लेखिका: MANVINDER BHIMBER
| चिट्ठा: मेरे आस-पास
वो कभी ये समझ नहीं पाया कि उसके साथ वो स्टेशन पर क्यों जाती थी। कई बार वो अलग पहुंचता और वो अलग। दोनों कुछ देर तक रेलवे स्टेशन पर साथ रहते। बात करते। गाड़ी आती और वो चला जाता। वो भी वापस लौट आती। यह सिलसिला सालों साल चला। एक दिन , वो अपन ...
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Jan 5, 2012
| लेखिका: MANVINDER BHIMBER
| चिट्ठा: मेरे आस-पास
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Jan 5, 2012
| लेखिका: रश्मि प्रभा...
| चिट्ठा: मेरी भावनायें...
सघन मेघों की तरह कुछ मेरे ख्वाब हैं
जो बरसना चाहते हैं
पनपना चाहते हैं
किसी मीठे फल की तरह !
कुछ ख्वाब हैं इन्द्रधनुषी
जिनसे एक यादगार होली खेलना चाहती हूँ !
एक ख्याल है हिन्दुस्तां की राजकुमारी जैसे
जो जिल्लेइलाही के खून की ...
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Jan 5, 2012
| लेखिका: bhartiyamahilaparivar
| चिट्ठा: विश्व महिला परिवार
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Jan 5, 2012
| लेखिका: Annu Anand अन्नू आनंद
| चिट्ठा: अनसुनी आवाज
कोल्हापुर से लौटकर अन्नू आनंद
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Jan 5, 2012
| लेखिका: वन्दना
| चिट्ठा: ज़ख्म…जो फूलों ने दिये
विकलांगता तन की नहीं मन की होती है
यूँ ही नहीं हौसलों में परवाज़ होती है
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Jan 5, 2012
| लेखिका: गीत
| चिट्ठा: गीत...............
नहीं कहा था मैंने
कि
गढ़ दो तुम
मुझे मूर्तियों में
नहीं चाहता था मैं
पत्थर होना
अलौकिक रहूँ
यह भी नहीं रही
चाहना मेरी ,
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Jan 4, 2012
| लेखिका: लता 'हया'
| चिट्ठा: ' हया '
आदाब ,आप सब को नया साल बहुत बहुत मुबारक हो .
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Jan 4, 2012
| लेखिका: Puja Upadhyay
| चिट्ठा: लहरें
मैं मर चुकी हूँ। बलूत कीसीली लकड़ी के ताबूत में मेरी लाश रखी है। दफनाने के पहले का दिन है। मेरी जानपहचान के सारे लोग अंतिम दर्शन कर चुके हैं। आखिर में तुम्हारी बारी है और सबतुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं। तुम सपनों के देश गए हुये हो।
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Jan 4, 2012
| लेखिका: Puja Upadhyay
| चिट्ठा: लहरें
तुमको भी एक ख़त लिखना था
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Jan 4, 2012
| लेखिका: रंजना [रंजू भाटिया]
| चिट्ठा: अमृता प्रीतम की याद में.....
घर, क़बीला, समाज, मज़हब और सिसायत भी हमारे चाँद-सूरज होते हैं, और इनको लगे ग्रहण के वक़्त जब किसी शायर, आशिक और दरवेश का जन्म होता है तो यह हकीकत है कि दर्द का मोती उसके मस्तक में पड़ जाता है...
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Jan 3, 2012
| लेखिका: Pakhi
| चिट्ठा: पाखी की दुनिया
(हिंदुस्तान, वाराणसी, 2 दिसंबर 2011 में चर्चा)
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Jan 3, 2012
| लेखिका: Akanksha Yadav
| चिट्ठा: शब्द-शिखर
विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ, भागलपुर, बिहार के सोलहवें महाधिवेशन (13-14 दिसंबर 2011) में युवा साहित्यकार एवं भारतीय डाक सेवा के अधिकारी श्री कृष्ण कुमार यादव को ’विद्यावाचस्पति’ की मानद उपाधि से विभूषित किया गया। श्री यादव को यह उपाधि उ ...
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Jan 3, 2012
| लेखिका: Kavita Vachaknavee
| चिट्ठा: "हिन्दी भारत"
हिंदी विदेशी भाषा की तरह है
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